सुरेंद्र की बातों को सुनकर लेखन क्यों विचलित हो जाते हैं ?

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सुरेंद्र की बातों को सुनकर लेखन क्यों विचलित हो जाते हैं ?

सुरेंद्र के द्वारा कहे गए वचन भाभी जी आपके हाथ का खाना बहुत है हमारे घर में तो कोई ऐसा खाना नहीं बन सकता है लेखक को विचलित कर देता है सुरेंद्र के दादी और पिता के जूते पर ही लेखक का बचपन बीता था उन जूते की कीमत थी दिन भर की हाथ तोड़ मेहनत और भन्ना देने वाली गोबर की दुर्गंध और ऊपर से गलियां धिक्कार

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